Saturday, December 17, 2016

khawashien

      
 एक शाम जब ज़िदगी बाहर खडी थी
 और बुलाकर पूछती रही
बोल क्या ख्वाइशें है आज तेरी
असमंजस थी मन में, इरादे कुछ और थे दिल में 
पूछु एक बार ज़िंदगी से 
क्या आज फिर वो मेरा मजाक बनाने आयी है 
शायद कल की ही बात थी 
जब एक नन्ही सी ख़्वाइश ने जन्म ही लिया था 
अभी तो आँखे खोलना शुरू ही किया था 
वक्त के बन्धनों ने ऐसा जकड़ा 
मानो बिखर सी गयी हो हर एक साँस 
उड़ से गए हो तक़दीर के हर एक पन्ने 
पूछा फिर मैने अपने आप से उस रोज 
क्यूँ और कब तक मरती रहेंगी ख्वाइशें 
बातें ये सारी जिन्दगी को बताने वाली थी 
कब शाम ढली और जिन्दगी चली गयी 
लो आज फिर मेरी ख्वाइश अधूरी रह गयी.......

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