Tuesday, May 28, 2024

 तीसरा तोहफा 

शैशवावस्था के २ वर्ष पूरे करने के बाद अब तुम बाल्यावस्था में प्रवेश कर चुके हो जहाँ तुम्हारी हर हरकत को शब्दों में बयां कर पाना बहुत मुश्किल है फिर भी मेरी कोशिश है कि तुम्हारी हर हरकत जो मेरे चेहरे पर मुस्कान लाती है खट्टी मीठी बातें   तुम्हारी नादानियाँ बयां करती है और हर बात को दो बार कहने की आदत कभी कभी मेरे अंदर झुंझलाहट पैदा करती है इन सभी को सदा के लिए बिना धुंधला किये सवाँर सकूँ |  

सुना है बच्चा जो देखेगा वही सीखेगा क्योकि तुमने अभी तक अपनी उम्र के बच्चो को खिलौनों से खेलते नहीं देखा था तो  तुम्हारे अंदर वो बच्चा वो बचपन नहीं आया तुम्हारी दुनिया मम्मी , पापा , दादी , दादा के इर्द गिर्द घूमती रही है जिससे तुम्हारे अंदर घर के काम करने की लालसा होती है सुबह शाम जब भी आटा गुथा जाता है तो तुम्हारे लिए थोड़ा ज्यादा लगाया जाता है क्योकि तुम्हें अपनी रोटी खुद बनानी है हाथ से बेलन लेकर भागने पर कभी कभी मुस्कान आ जाती है तो कभी कभी आंखों को बड़ा करके तुम्हें डराया जाता है जिस पर तुम खिलखिला उठते हो और ये जिद्द दिन ब दिन बढ़ती जा रही है कितना ही तुम्हें बहलाया फुसलाया पर तुम्हें आटा इतना प्रिय क्यूँ है आज तक मैं समझ नहीं पायी हूँ | 

नयी माँ होने के नाते मुझे अभी पता नहीं है कि अच्छी परवरिश की क्या परिभाषा होती है|  लेकिन जब भी मुझसे हर बात मेँ कहा जाता है कि मैंने तुम्हें बिगाड़ दिया है या उसको दो कौड़ी का कर दिया है तो मुझे बुरा लगता है चाहे मैंने तुम्हारे जो किया हो मैं इतना जानती हूँ कि तुम्हारे लिए बुरा हो ऐसा मैंने कुछ नहीं किया तुम्हारी हर छोटी चीज़ का ध्यान रखती हूँ जिससे तुम्हें परेशानी न हो , जब भी तुम तुम बीमार होते हो तो , तुमसे ज्यादा तक़लीफ़ मुझे होती है जहाँ कही तुम्हारी ज़िद ज्यादा बढ़ती है वहाँ तुम्हें थप्पड़ से प्यार से समझाती हूँ फिर मैंने तुम्हें दो कौड़ी का कैसे कर  दिया है ? इसी वर्ष तुम्हारे जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ है शिक्षा का अध्याय | 

जब तुम पहले दिन अपने स्कूल गए तब मुझे अंदर से अच्छा नहीं लग रहा था या कहुँ एक डर था कि तुम अकेले कैसे रहोगे , कहीं गिर न जाओ , खाना खुद से कैसे खाओगे , और अपने डर को छिपाते हुए मैंने तुम्हें बताना शुरू कर दिया कि डरना नहीं , शु -शु   आये तो मैडम को बता देना, खाना खा लेना और  कुछ | 

ये तो थी पहले दिन की कहानी , जब तुम्हें थोड़ा समझ आया की वहाँ मम्मी के बिना रहना है तो दूसरे दिन से  लेकर स्कूल की छुट्टी होने तक तुम्हें स्कूल भेजना बहुत मुश्किल भरा काम हो गया है अब वही प्रक्रिया जुलाई से फिर शुरू करनी होगी , स्कूल से वापस आने पर जब तुम अपनी मासूमियत भरे चेहरे से नादानियाँ भरी बातें सुनाते हो कि आज मैंने आप - आप खाना खाया था , माधव ने मुझे धक्का मार दिया , मैंने मन्नू का खाना खा लिया , उसमें बहुत मिर्च थी ( तुमने मन्नू का खाना क्यूँ खाया ? अपना खाना खाते है  , गुस्से में कहते हुए ) और फिर ढेर सारा प्यार , तुम्हारी इन बातों और भोलेपन पर करती हूँ | 

स्कूल का आठवां दिन जिंदगी का सबसे यादगार दिन है मेरे लिए , क्योकि जब तुमने स्कूल से आते ही कहा - मम्मी मैं केक्टर ( कलेक्टर ) बनुँगा और ये बात मैंने फिर से पूछी - क्या बनोगे केक्टर , तुम्हारे इन बालमन के भावों पर मुझे हसीं आ रही थी और कहीं न कहीं तुम्हें तुम्हारे सपने की छवि में देख रही थी , और  पूरे दिन इस बात की रट को सुनती रही समझती रही , साथ में हर काम को हाथ लगाना तुम्हारे लिए खेल है कभी -  कभी अत्यधिक भागीदारी हमारे अंदर इतनी झुंझलाहट पैदा कर देती है कि न चाहते हुए भी थप्पड़ मारना पड़ता है|  खैर , उम्र भी अभी शुरू हुई है अगर हर बात को बच्चा समझने लग जाये तो वो बच्चा नहीं समझदार बड़ा है ,पर हम बड़ो की भी आदत है हर चीज़ को तुम्हारे हाथ से छुड़ाने की , हर बात पर टोकने की , तो शायद वही आदत तुम भी  सीख  रहे हो | 

ये वर्ष तुम्हारे लिए अनेकों नए अनुभव के साथ आयी है जिसमें तुम्हारा मुंडन संस्कार जिस पर तुम चीख चीख कर रोये कि हाथों की मुट्ठी बनाकर तुम्हारे लिए जरुरी है कह कर सहन करना था ये तुम्हारे लिए अनुभव ही था कि अब तुम बिना रोये यहाँ तक कि बाल काटते समय हसते हुए बात करते हो सीख गए | 

अपने पापा की तरह की तरह तुम्हें भी puppy से डर नहीं लगता , अमूमन बच्चे इस उम्र में थोड़ा हिचकते है पर तुम इतनी आसानी से उन्हें घर में लाकर दूध पिलाने की ज़िद्द करते हो , तो अच्छा लगता है | 

हम अपना बचपन भूल जाते है बैसे ही जैसे मेरी माँ तुम्हारी नानी मुझे अक्सर बताया करती है कि मुझे भी बचपन में कलर करना ,चित्र बनाना बहुत पसंद था बैसे ही तुम्हें भी कलर करना अच्छा लगता है 

हाँ आम, केला ,संतरा के साथ साथ पूरी किताब पर कलर होता है वो बात अलग है | 

वैसे तो ब्रज की भाषा की साख पूरी दुनिया में मिसाल कायम करती है , ब्रजभाषा में ही न जाने कितनी संस्कृतियां किताबों में गढ़ दी गयी है पर आधुनिकता को देखते हुए जो प्रतिस्पर्धा आज के समय में चल रही है उसमें सबसे पहले भाषा को ही तवज्जो दिया जाता है कि फलाने का बेटा , नाती ,छोरा और भी बहुत कुछ की बोली कितनी अच्छी  है लेकिन जब तुमसे तुम्हारी अम्मा , हरामज़ादे , काम न काज को ढाई मन अनाज को , जब देखो तब खावे खावे की केहतो रहेगो , अपने बाप से कहदे , बाबा से ही कहेगो , कुआँ में जा गिर , और जब तुम ज्यादा रो देते हो तो हाथ पकड़कर घसीटते हुए घर से निकालती है तो डर लगता है , कि कहीं तुम्हारे बालमन हीन भावना से न भर जाये , वैसे तो तुम स्वयं भगवान रूप हो , लेकिन साथ ही साथ कच्ची मट्टी के समान भी , जिस रूप में ढालोगे उसी रूप में पकोगे भी | 

ईश्वरतुम्हें लम्बी उम्र,सद्बुद्धि प्रदान करे , ज़िंदा ज़िन्दगी जियो | पिछले पत्र की तरह मेरी भावना तुम्हें कथा कहानी न लगे|   

तुम्हारी प्यारी मम्मी 


Saturday, May 27, 2023

दूसरी चिट्ठी

वक़्त किताबों के पन्नों की तरह पलटता जा रहा है और ऐसे ही अब तुम २ वर्ष के एक नन्हें से फूल बनते जा रहे हो ,नन्हें फूल की शैतानियों किलकारियों से अब पूरा घर जगमग जगमग करता है सुबह से रात तक बस तुम्हारी ही आवाज़ गूँजा करती है ,कभी खिलखिलाने की ,कभी रोने की ,कभी हॅसने की |  अब तुमने अपने पैरों पर चलना सिख लिया , न जाने कितनी बार गिरे , गिरकर उठे और कोशिश की और आखिर में अब  चलना क्या दौड़ लगाना भी बख़ूबी सिख लिया है 

पिछली चिट्ठी मैंने अपने अहसासों को तुम तक तक पहुँचाने की कोशिश की लेकिन अब तुम्हारा बचपन इतना बड़ा हो गया कि हर दिन के अलग अलग किस्से है, कभी किसी दिन तुमने रसोई की अलमारी खोल दी और सारे बर्तन उसके बाहर निकाल दिए या कहुँ ये तुम्हारा सबसे प्यारा काम हुआ करता था जिस पर मुझे अक्सर झुंझलाहट आती थी और मैं गुस्से से तुम्हें उठाकर तुम्हारे खिलौनों के पास बैठा दिया करती थी पर जब तक मैं वापस रसोई तक पहुँच पाती कि तुम मेरे पीछे खड़े होते , अरे ! इतनी जल्दी , अभी तो बैठाया था और फिर हसीं की फ़ुहार के साथ तुम्हें गोद में उठा लेना , दूसरा सबसे प्यारा काम भगवान जी के मंदिर से उनकी मूर्ति को ही उठा लाना कभी तो उनको सिंघासन से निचे ही गिरा देना यह सब शायद तुम्हारे मन में उठे उत्सुकता के बीज थे जो अब धीरे - धीरे पनप रहे है कि मन्दिर में जाते ही सबसे पहले प्रणाम किया जाता है ,फिर दंडवत जो अब बिना बताये करते हो और सीख भी रहे हो जीवन के ढंग को | 

जब भी तुम्हें पढ़ने के लिए बोलती हूँ या मैं कहती हूँ कि वन बोलो अच्छा एक बोलो और तुम इधर उधर देखकर मुझे गले लगा लेते हो और इतना प्यार जताते हो , कभी तो अपना सिर तकिया पर रखकर झूठ मूठ के खर्राटे भरते  हो ऐसे जताते हो कि बस अब तो नींद आ ही गयी है मुझे अपने साथ खेल में लगा करके अपनी जीत का जश्न मनाते हो कि आज तो पढ़ाई से बच गया , मुझे हारकर भी इतनी ख़ुशी मिलती है जैसे पूरा आसमान जीत लिया पर हाथ मेरे अभी भी खाली है और मैं भी बस चलो कोई बात नहीं ऐसे ही धीरे -धीरे मन लगेगा कहकर छोड़ देती हूँ 

बीमार होने पर जब अपनी दवाई तकिये के नीचे छुपा करके उस पर लेट जाते हो तुम्हारी ये नादान चालाकियाँ देख कर हसीं आती है और समझ आता है कि कैसे तुम खुद को होशियार मानने लगे हो और अभी से मुझे बनाने लगे हो फिर मुझे पास आता जो खिलखिला कर हॅसते हो मानो लगता है कि अभी - अभी दिनकर ने कोमल किरणों से उजियारा कर दिया हो और नन्हीं कलियों ने खिलकर कुसुम का रूप लिया है 

ईश्वर की बनाई कितनी अनमोल रचना है एक माँ 

और इस रचना के साथ ही न जाने कितने कौशल उसके भीतर छुपे रहते है कि कैसे तुम्हारे बिना स्पष्ट शब्दों को में इतनी कुशलता से जानना सीख लिया , तुम्हारे आने से मुझे मेरे छुपे कौशल भी मालूम हो रहे है तुम्हारे शब्द बेहद ही कोमल और मन को सुकून देने वाले होते है |  क्योंकि तुम्हारा स्वाभाव  अभी बहुत ही ज़िद्दी है तो तुम्हारे ज़िद की सीमा मेरे धैर्य की सीमा को पार कर जाती है तो  मेरा हाथ तुम्हारे ऊपर उठ जाता है और फिर तुम्हारी आँखों में ,जो चमकते सितारे की तरह दमकती है छोटे -छोटे आँसु निकल आते है जो तुम्हारे कोमल गालों को इस तरह गिला करते है जैसे गुलाब पर ओस फिसल आयी हो उन बूंदो के साथ मैं भी पिघल जाती हूँ सीने से लगाकर - अच्छा ठीक है पहले चुप हो जाओ कहकर तुम्हारी सभी बातें मान लेती हूँ तो तुम भी सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाते हो लेकिन मेरे मन में बहुत कुछ कौंध कर जाता है वो ये मैंने तुम्हें क्यूँ मारा ,हुआ वही जो तुम्हें चाहिए था पर अगर इसी तरह तुम अपनी बात मनवाते रहे तो ये तुम्हारे लिए अच्छा साबित नहीं होगा | 

तुम्हारी नादान चालाकियों के किस्से इतने सुहावने होते है की घर का मौसम बदल जाता है जैसे कल की बात है सुबह तुमने हलवा अपने बाबा के पास बैठ कर खाया  और उनसे पूछा भी नहीं कि बाबा खा लो लेकिन जब तुमने खीरा खाया तो बाबा को भी खिला दिया उनके मना करने पर भी जबरदस्ती खिलाया फिर तुम्हारे बाबा का कहना -: कि कितना चालाक है हलवा की तो मुझसे पूछी भी ना , जै खीरा हमें खिला रहा है बढ़िया माल खुदने खाये ,खीरा हम खाये , पर यहाँ तुम्हारे मन को समझना जरूरी है क्योकि तुमने शायद बाबा को सुबह हलवा खाते नहीं देखा है, तुमने उन्हें रोज खीरे को खाते देखा है तो अभी तुम्हारा मन देखी हुई स्थिति को ही समझ सकता है इसलिए शायद तुमने उन्हें वही दिया,  और अगर दूर से आ जाए आवाज तुम्हें chunnu की तो जो खुशी चेहरे पर दिखती है जैसे दूर कहीं आसमाँ से तारे तोड़ लिए हो पापा के घर आते ही समझ जाते हो की ice-cream आयी है और जो पापा न लाये हो तो भी खुशी कम नहीं होतीं फिर पापा के ऊपर बैठ कर जो मस्ती तुम करते हो जैसे पापा नहीं खिलौना मिल गया है |

मेरी चिट्ठियों को समझने में तुम्हें अभी बहुत समय लगेगा, पढ़ने तो तुम जल्दी लग जाओगे,  लेकिन समझने के लिए एक लंबा इंतजार मेरे हिस्से में आएगा और मैं उस इंतजार को सब्र के साथ बांधे रखूंगी, आशा रखूंगी कि बदलते ज़माने के साथ तुम्हें मेरी ये चिट्ठियां फिजूल न लगे, कथा कहानी न लगे  ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसे ही अनेकों नादान किस्से हर घर में आए |

Tuesday, March 28, 2023

निःशब्दता

शादी के एक हफ़्ते बाद -:   नया घर , नये रिश्ते , नयी रिवाज़ , नया पहनावा , नये चेहरे और मैं भी बिल्कुल नयी सी थी , उस दिन शाम ४ बजे जब मैंने अपने साथ लाया कार्टून खोला तो , उसमें अब तक जमा की गयी मेरी कुछ किताबें थी जो मुझे बहुत प्रिय थी , मेरी सास ने जब वो किताबें देखी ,तो मैं उनका चेहरा देख रही थी बिल्कुल शून्यता थी दोनों चेहरों पर , पता नहीं क्या होगा , मेरे मन मस्तिष्क में सब कुछ जैसे थम सा गया हो , बिल्कुल शान्त थी मैं  | फिर उन्होंने जो कहा उसको सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी , मेरी सोच से इतने परे थे वे शब्द जो शायद एक तूफ़ान को भी झकझोर दे , किसी भी अस्तित्व को जड़ से हिलाने  के लिए वे शब्द इतने मुलाज़िम थे कि शायद वर्षो तक आपके ज़हन में कंपन पैदा कर जाये |  प्रेमचंद जी की एक बात मुझे बहुत याद आती है " औरत कुछ भी सहन कर सकती है पर मायके की निंदा असहनीय है " |                                                                                                                                                                       उस दिन जो मैंने उनसे सुना वो शायद मेरे ही नहीं बल्कि शिक्षा जगत के अस्तित्व को कमज़ोर करने लायक है , सवालों का सबब तब से लेकर आज तक मेरे मन में उमड़ रहा है , उस दिन जो शब्द कहे गए थे वे किताबों के जगत को आश्चर्य में डाल देने वाले थे , मुझे नहीं पता कि वो समय गलत था अपनी किताबों को अपनी अलमारी में रखने का , या  मैं गलत थी जो मैंने अपनी माता -पिता की बात को अनसुना कर दिया जो उन्होंने मुझे मना किया था अपने साथ किताबें ले जाने को , क्योंकि शायद उन्होंने पहले ही भाप लिया था कि अगर मैं अपने साथ किताबें ले जाऊँगी तो मुझे ऐसी िस्थति का सामना करना पड़ेगा जिसके लिए मैं बिल्कुल तैयार न थी |  मेरी प्रिय किताबें , जिन्हें पढ़कर मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है , जो मुझे हर दिन चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देती है , जो मुझे बताती है कि मुझे खुद को सवारना है , जो मुझे मेरे होने का एहसास दिलाती है , जो मुझे अकेला महसूस नहीं होने देती , जो मेरे अंतर्मन में कोमलता का भाव बनाये रखती है , जो मुझे द्रढ़ता प्रदान करती है उनके लिए मैं इतनी कठोर बात कैसे सहन कर सकती हूँ , या मैंने सहन की उस पल में और चुप रह गयी , उस वक़्त मेरी कोमलता शीशे की तरह बिख़र गयी और मैंने ठान लिया कि मेरी चुनौतियों का समय अब शुरू हो चुका है , आज से मेरी परीक्षा का समय है , हर दिन एक नयी चुनौती , जिसमें मैं अपनी पूरी कोशिश  करुँगी , उस दिन से आज तक मैंने अपनी कोशिशों को कभी विराम नहीं दिया और आगे भी नहीं ,ये सब इसलिए नहीं कि मुझे उनसे बदला लेना है या उनको जबाव देना है , जबाव मेरे पास उस दिन भी था और आज भी है  बल्कि इसलिए कि जिनके अस्तित्व पर ऊँगली उठाई है , अपने साथ लाने पर उनके सहारे मैं ख़ुद को खड़ा कर पाऊं |                                                                                                                                                                           और आखिर में वो शब्द थे -: "तुम्हारे बाप ने दहेज़ में सिर्फ़ तुम्हें किताबें दी है "  ये शब्द लिखते हुए मेरे हाथ काँप रहे है  पर क्यूँ ? सवाल -: शादी के बाद अपने साथ किताबें लाना गलत है  ? या मेरे पापा ने फ्रिज और सब सामान नहीं दिया वो गलत है ? क्या किताबें इतनी तुच्छ वस्तु है जो दहेज़ में नहीं जाती है ? या एक जो मेरे मन में कौंध कर जाती है वो ये कि जिस घर में किताबों के आने पर दहेज़ की बात उठायी जा रही है क्या वो घर सही है ? 

Monday, June 27, 2022

मेरा अंश

बात 28 /05 /2021, दिन शुक्रवार  की है जब तुमने इस दुनिया में रो रो कर कदम रखा , उस समय ऑपरेशन थिएटर में जब पहली बार मैंने तुम्हारे रोने की आवाज़ सुनी तो तुम्हारे साथ आँसू मेरे भी आये थे , वो चंचलता , विवशता तुम्हें देखने की जो मेरे अंदर बढ़ती जा रही थी खुद को रोके रखना मुश्किल भरा था , उससे भी ज्यादा मुश्किल था तुम्हें गोद में न उठा पाना | 

उस समय हॉस्पिटल के बेड पर जो महसूस हो रहा था वो ये की वक़्त के हाथों मेरा जीवन आगे बढ़ रहा है या फिर उसी के हाथों फिसल सा रहा है, जो दर्द मैंने महसूस किया उसका  एहसास मात्र भी तुम तक न पहुँच पायेगा | फिर भी मैंने कोशिश की तुम्हें अपनी बाँहों में उठाने की , अपनी बाँहों में घेर कर मेरा मन आँसुओं में बह जाना चाह रहा था पर खुद को रोके रखा , तुम्हें अपनी गोद में देख कर मैंने ये सोचा की कैसे एक औरत नौ माह तक सब्र के दरवाज़े खोले रखती है कैसे उसको इंतज़ार होता है बस अपने अंश के आने का | 

सिर्फ एक अहसास | 

मेरा अंतर्मन खिल उठा जैसे सूरज की पहली किरण ने आँखे खोली और वो सीधे सूरजमुखी पर जा गिरी , तुम्हें गोद में उठाते ही मैं नज़र भर बस तुम्हें देख रही थी, देख रही थी  की तुम कैसे नौ माह तक खुद को मेरी कोख में संभाले रहे , मैं तो बस तुमसे ऊपर से बातें करती थी 

तुम्हें मेरी बातें सुनाई देती थीं या नहीं ? 

सुनाई देती होंगी ! 

तभी तो जब मैं तुमसे कुछ कहती तो तुम अपना हाथ या पैर हिला दिया करते  थे, समझ जाती थी की तुम्हें भी मेरा अहसास पता चलता है | आँखें खोलने पर जब पहली बार तुमने देखा तो ऐसा लगा की पिछले नौ महीने कोई कष्ट था ही नहीं , सब कुछ धुंधला सा हो गया और उस धुंध से निकल कर बस  तुम आये हो मेरे पास | 

मुझे माँ कहने !

अभी तो तुम्हें आये बस एक महीना हुआ है | 

"अभी तो बहुत कुछ रचा जाना बाक़ी है , बाक़ी है अभी तुम्हें सही ढाँचे में रचना "

पर अभी तो मुझे भी सीखना बाक़ी है तुम्हें कैसे संभाला जाये, इतनी सी जान और इतना रोना चिल्लाना | 

कष्ट तो तुम्हें भी होता होगा !

मैं जब भी तुम्हारे सर पर हाथ  फेरा करती हूँ तो मंद मंद मुस्कराहट तुम्हारे चेहरे की देख समझ जाती हूँ की मेरा ऐसा करना अच्छा लगता है | अभी तुम एक नन्ही कली के समान हो जिसने अभी अभी जन्म लिया है | 

ऐसे ही बातों बातों में एक महीना भी हो गया है और तुमने अपने हाथ पैर चलाना शुरू कर दिया है , धीरे -धीरे तुम ऐसे ही रंगो से सजी दुनिया में घुल मिल जाओगे , ख़्वाबों का रंग, दुआ का रंग ,घटा  का रंग , बन्दगी का रंग , हँसी का रंग, हर रंग के वज़ूद में खुद के रंग को ढूँढना है तुम्हें | तुम्हारे साथ मैं भी अपने बचपन को जी रही हूँ , कि कैसे मैंने भी अपने बचपन में अपनी माँ और तुम्हारी नानी को परेशान किया होगा , तुम्हारी हर छोटी छोटी कोशिश , नादानी , शैतानी और  मासूमियत जैसे किसी चोट पर मरहम हो और सब कुछ बस प्यारा सा लगने लगे ऐसे हो तुम | तुम्हारी हर एक चीज़ को लगाव से रखना ,कोशिश करना कि तुम्हें कोई तक़लीफ़ न हो सब कुछ करना मेरे लिए भी बिल्कुल नया है | 

"अपनी माँ की गोद से निकल कर मैंने तुम्हें अपनी गोद में पाया है " थोड़ा वक़्त तो लगेगा मुझे भी | 

रात -रात भर तुम सोते नहीं हो क्योंकि तुमने अपनी नींद दिन में पूरी कर ली होती है थकान के कारण मुझे तुम पर गुस्सा आ जाता है, लेकिन  फिर जैसे ही मेरी नज़रे तुम्हारी नज़रों से मिलती है तो वो मासूमियत ,वो नटखटता जैसे बहुत कुछ कहने को बेताब हो देख कर मेरी थकान और गुस्सा दोनों ही मुस्कान में बदल जाते हैं | मैं कोशिश करती हूँ कि तुम्हारी हर याद को, अदा को, आब -ओ -आब को कैद कर  तुम्हारे अंदर एक आज़ाद पंछी होने का बीज़ सृजित करूँ और वक़्त के साथ तुम्हारी हर उड़ान को देखती रहूँ | 

अभी तक तो तुमने सिर्फ हाथ पैर चलाना ही सीखा था पर अब करवट लेना भी सीख गए हो तो करवट लेते लेते कहीं बेड से न गिर जाओ इसके लिए में तुम्हारे चारों तरफ़ तकिया लगा कर जाती हूँ लेक़िन तुम ठहरे तुम ,तकिये के ऊपर ही सो जाते हो | तुम्हारी शैतानियों के मुस्कराहट के कि कैसे आज तुमने अख़बार को हाथ से पकड़ कर खींचा था ,कैसे आज अपने खिलौने को पहले पकड़ा फिर ज़ोर से फेंका भी था हर छोटी हरक़त जो मन को लुभा देती है के किस्से अब फ़ोन पर तुम्हारी नानी , बुआ और सभी को बताना शुरू हो गए है | 

मुझे चिट्ठियाँ लिखना पसंद है इसलिए तुम्हारे लिए भी एक लिख रही हूँ , अभी तुम शब्दों की दुनिया से अंजान उस स्याही की तरह हो जिसे सही क़लम में भरा जाना बाक़ी है , उस स्याही का रंग बेबाक़ी साहस और बहुत सी प्यारी यादों भरा हो ऐसी मेरी कोशिश रहेगी , जब मेरी लिखी चिट्ठियाँ तुम तक पहुँचे तो मैं चाहती हूँ कि तुम न केवल उन्हें पढ़ो बल्कि उनके जरिये अपने बचपन को याद करो और ज़वाब मैं मुझे भी चिट्ठियाँ ही लिखो

हमारे लिए लिखी गयी चिट्ठियाँ अक्सर हमारे ख़ाली समय में पढ़ी गयी हमारे विचलित मन को जैसे तूफानों के बवंडर के बाद जो शान्ति आती है वैसे ही सुखद अनुभव देती है , मैं भी तुम्हारे आने वाले समय के तूफानों के पीछे के एकाकीपन का जरिया अपने शब्दों को बनाना चाहती हूँ कि जब तुम ज़िन्दगी के ऐसे मोड़ पर हो तो तुम्हें अकेला महसूस न हो | जैसे जैसे तुम बढ़े हो रहे हो मेरी भी जिम्मेदारियाँ तुम्हारे प्रति बढ़ रही है , तुम्हारी देखभाल से लेकर हर हरकत पर मुझे खरा उतरना होगा , बढ़े तुम हो रहे हो लेकिन बड़ा तुम्हें मुझे बनाना होगा , हर एक विचार जो तुम्हारे मन में कौंध करेगा उस पर मेरे विचारो , संस्कारो और परवरिश से पोषित होगा और उन सबके बीच मेरी कोशिश रहेगी कि तुम्हें मैं रंग भरना सीखा सकूँ हर एक ख़्वाब में | 

तुम्हारी अलबेली 

Monday, December 2, 2019

सफर कुछ नया सा है मेरे हाथों की खनक एक जिम्मेदारी साथ लाती है याद दिलाती है की परवरिश की असली परीक्षा को पास करना है एहसास नया है और रास्ते मेरे अब और भी आसान होंगे ऐसा एहसास कर पाना थोड़ा मुश्किल सा मालूम लग रहा है
दिन की शुरुआत कुछ इस तरह से हुई हरी चूड़ियाँ और पायल मुझे सजा रही थी  साथ ही साथ एक जिम्मेदारी  का आगाज़ मेरे हाथों की एक एक चूड़ी अपनों की याद में खनकने लगी अब तुम्हें दो घरों के सपनों को मुक्कमल करना है इन चूड़ियों को जंजीर मत बनने देना सिन्दूर मेरा मुझसे जिरह करने लगा
आँखों का काजल आज कुछ काला सा नजर आया वरना अभी तक तो रंग फीका ही था
वरमाला में सजाया एक एक फूल मेरे अंतर्मन को झकझोर रहा था बढ़ते कदम मेरे या अपनों से पीछे होने का गम मेरी प्राण चेतना की जद्दोजहद घेर रही थी बचपन का आँगन या नयी रोशनी का घर चुनना बहुत कश्मकश भरा है एक लड़की के जीवन में
पड़ाव कुछ नया सा है और आशाओं से भरा आगाज़ हुआ है मेरे कदम दर कदम साथ चलने का धैर्य लिए मेरे जीवन साथी का सात फेरे ,सात वचन कसम रिवाज़ और उनमें सबसे महत्पूर्ण अग्नि का साक्षी होना।
कहते है कन्यादान संसार का महादान है फिर इस दान की महिमा इतनी सी है की पल भर में पिता के आशियाने को छोड़ना पड़ता है
लिखने को बहुत कुछ है बचपन की अठखेलियां लिखुँ की पिता के आंसू लिखुँ जो कन्यादान के समय उन्होंने अपने अंदर छुपा लिए न जाने कितनी बार उनको रोका होगा पोछा होगा और फिर चेहरे पर वही पुराना रौब बड़ी अदब के साथ।
माता पिता जब वर वधु को आशीर्वाद देते है सदा सुखी रहो तो एक बवंडर उठता है कि अपने घरौंदे से गौरिया
को आसमान में बादलों के बीच उड़ने की कह रहे हो मानो उन्होंने ये विश्वास कर लिया है कि उनकी चिड़िया परिपक्व पंखो को आज़ादी दे देगी
सदा सुखी रहो।
अग्नि को साक्षी मान दो पंछियो को एक पंख में बाँध उड़ने के नियम बताये जाते है
हर वचन कंठस्थ कर लिया गया है आपके साथ
सपने जो अधूरे है मेरे ताक पर रखे है आपके साथ पूरे करने को
शादी मुबारक
24 november की तारीख
एहसासो का समुंद्र है
मोतियों को ढूढ़ना है
मुक्कमल दस्ताने इश्क़ है
नूर ए दस्तूर गुलाबों से सजाना है

Saturday, September 7, 2019

सारा शहर विकलांग है 

रास्ते जिन पर हर रोज
मज़िलों की आहट गुजरती है
उन पर आँसुओं के कदमो को
कदम भर जगह न मिली
भरे ज़माने की खाली रातों में
क्षण भर में  अस्मिता छीनी
चीखी सन्नाटो के शहर में
भूल बैठी ,भूल बैठी की ये
सारा शहर विकलांग है
स्याह रातों की चीखों को
बड़े ही अदब से अनसुना
 करना बखूबी मालूम है उसे
दहशत फ़ैल गयी शहर में
अस्तित्व पर जो दाग लगे
और पूछा गया - ये दाग ,
और कहाँ कहाँ है
 किस किसने दिए ये दाग
बेशर्म हया थी मेरी जम्हूरियत
बदहवासी कांपती जुबान थी
इतना ही कह सकी बस
खुशनसीब होती जो कोख से
अस्तित्व में न आती ,
सड़क पर जो छींटे थे
हर एक ने हिस्से में बाटें थे
सिसकियाँ फाइल के पन्नों में
लिपटा दी जायेंगी अब ,
प्रमाण पत्र भी न माँगा
जायेगा चरित्र का ,
वो तो अब हर एक शख्शियत द्वारा
अखवारों किताबों और टीवी
पर बड़े ही अफसोस के साथ
सुबह की चाय में पढ़ लिया जायेगा
इंतज़ार रह जायेगा अगली सुबह
एक नयी खबर का | 

धुआँ या ज़िन्दगी 

मैली फटी धोती तलाश गुज़र थी एक कोना संदेह की लकीरें प्रबल होती ललाट पर उसके कुछ कोशिशों की  खाली जेब भरी माचिस आरज़ू कुछ न थी बस थोड़ा सा सफ़ेद धुआँ आदि हो गयी थी उस जहर की जिसे 
वो हर रोज पीती खाती और उड़ाती 
ये एक कोना मानो उसका रेस्टोरेंट था जहाँ वो तय समय पर पहुँच जाती है अकेले | 
नहीं अकेले नहीं समय और धुँए के साथ दो घंटे बिताते हुए प्रयास रहता है अपने हस्ताक्षर करने का जैसे की तमाम कागजातों को उसकी मंज़ूरी का वर्षो से इंतज़ार है उसे उन कागजो की अर्जी को मुकम्मल करना है 
हर दिन मिट्टी पर लकीरें बना और मिटाना उसका पेशा बन गया था 
आज समय से थोड़ी देर में पहुंची वो शायद मांगने में देरी हो गयी और आज धुआँ भी नहीं है उसके पास
कुछ मिला नहीं उसे आज जिससे वो उस धुएं को खरीद सकती
हस्ताक्षर करने की कोशिश भी न की हाथों में जान मालूम नहीं पड़ती उस धुएं में ही तो उसका पोषण था जो भर पेट उसे न मिला तभी एक शख्शियत द्वारा उसकी तरफ कुछ रूपये फेंके गए नज़रो को गहरा कर उसने उन रुपयों की तरफ ध्यान बरकरार रखते हुए उस व्यक्ति को उसकी तिलिस्म वापस कर कहा -
साहब ! मैं भीख नहीं लेती बस मांग कर गुज़ारा कर लेती हूँ
उसके इस जवाब ने दिमाग में एक कौंध करते हुए चिंगारियों की ऐसी अलख सी जगा दी स्वाभिमान की बात को उसने अपनी ढाल बनाते हुए ज़माने को एक तमाचा जड़ते हुए अपनी बेबसी जाहिर न होने दी
और फिर शायद वो पूरी तरह तैयार थी अपने हस्ताक्षरों के साथ एक अमिट छाप
एक औरत की ललकार। 

Sunday, July 7, 2019

दुनिया से रूबरू होने का अस्क मैने बचपन में ही पी लिया था कहते है दुनिया घूमना आसान नहीं पर मैंने कर दिखाया मैंने तमाशे भी देखे और मेले भी सौभाग्य से  ये अवसर मेरे जन्म के दिन ही मुझे मिल गया जब मेरे पिता ने मुझे गोद में उठाया उनके एक एहसास ने बेमूल्य ख़ुशी दी
उनकी गोद में ही दुनिया का एक आधा चक्कर लगा दिया पहला कदम जब धरती पर रखा तो चारों तरफ एक घेरा था घेरे में बँधे हुए पापा के हाथ जो आज तक बँधे हुए है घेरा जो कभी खुल नहीं सकता था जिसमें प्रवेश करने के असीमित तहजीब और तवज्जो ने रियायतों ने कोशिश की समाज नाम के एक बड़ी सियासत ने मुझ पर हुक्मों का दौर चलाने की कोशिशों में कमी न छोड़ी  नज़रों के शहरों से गुजरकर भटकती गलियों से मंज़िलो को पकड़ना आसान न था लेकिन वो घेरे ही थे जो हर प्रहार को रोके हुए थे मेरी हँसी शरारतें मेरी गलतियां सब उस घेरे में समायी थी मेरे गिरने की जो टीस पापा के दिल में समायी थी आज तक छुपी हुई है
कभी जाहिर न होने दिया
हर एक सीख जो आज तक मिली मेरे जेहन ने अपने आप में बसा ली कुछ इस तरह की अब चाहे कितने भी मोड़ भटकाव आये इस पर चलना जिद है मेरी क्योंकि वो बहुत अजीज है मेरे लिए
पापा दो शब्द नहीं दूसरे जन्म के पुण्य है जो अब मिले है
खुशनसीब हूँ की मेरे पास दो शब्द  है अब दौर कुछ बदल सा गया है घेरा कुछ खुला सा है या पापा के हाथ कमजोर पड़ गये
कमजोर हो समाज की सियासत से बचाते बचाते मुझे कुछ यूँ आपको लकीरों में देख कर आँख भर आती है
फिर सोचती हूँ पापा समझ गए में अब बड़ी हो गयी हूँ मुझे आसमान में उड़ना है पर अकेले इन तमाशगिनो के बीच से होकर गुजरना आसान न होगा पर आपकी दी तालीमों ने मेरे फितरत को इतना मजबूत बना दिया है कि उसको छू पाना भी रियासतों की पहुंच में नहीं
पापा आज मुझे डर सा लगा है घेरा कुछ खुला खुला सा है दस्तक को का दौर है जिसकी कल्पना भी मेरे शब्दों के परेह है
कितना अजीब सा दुःख है इस समाज की सियासत में हर दिन एक नया नियम आएगा हर दिन एक लड़की को उसके पिता से अलग होना पड़ेगा
उम्मीद है
जज्बा कायम रहेगा
यूँ ही आशीर्वाद बना रहे
यादों का कारवां चलता रहेगा 

Sunday, May 5, 2019

बेबसी 

माँ वो अनगिनत पृष्ठों की किताब है जो जितनी बार पढ़ी जाती है उतनी बार एक नयी कहानी गढ़ती है  हर एक पन्ना कीमती होता है अगर कभी यही किताब खो जाये तो रोशनी के बावजूद अँधेरा होता है कुछ ऐसा ही बयां कर रहे थे उसके आँसू  आज क्लास में जब बहुत दिनों बाद आयी तो मैडम ने पूछा सोनिया इतने दिनों बाद इतनी छुट्टी क्यों करती हो कोर्स कैसे होगा  कुछ पल को सहम सी गयी और बोली मैडम दादी मना कर देती है  घर का सारा काम मुझे करना पड़ता है उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा मैं ही हु मैडम तेज आवाज में बोली अपनी दादी से मेरी बात कराना मैं समझाउंगी अभी से इतना काम करोगी  तो पढ़ोगी  कब कल से तुम्हे हर रोज आना है |  ठीक है मैम कल से हर दिन आएंगे और रोने लगी  उसका रोना देख कर लग रहा था जैसे सालों से इंतज़ार कर रही थी रोने का  हर एक सुबकी में दर्द छुपा था और शायद ख़ुशी भी थी कि आज किसी ने तो हमदर्दी दिखायी उसका हर एक आँसू उसकी बेबसी का सबूत था 
वो बेबसी जो आज तक किसीसे कह नहीं पा रही थी आज उसने बता ही दिया 
तीन साल की थी जब उसकी माँ इस दुनिया को छोड़कर चली गयी पापा ने दूसरी शादी की और अलग हो गए दादी की तालीम से बड़ी हुई है दादी की भी अब उम्र हो चली थी कहने को बड़े भाई और भाभी है पर वो जल्लाद से कम नहीं है किस्मत खराब होती है सुना था पर खाली भी होती है आज देख लिया | 
उसके आँसू बांटकर सुकून भी था और गुस्सा भी की ६ महीने से वो क्लास में आ रही थी पर आज तक मैं उसके दुःख को नहीं देख पायी उसका हर एक आँसू भाभी के अत्याचार के बोझ तले दबा हुआ था आज घर जाकर उसको थोड़ा हल्का महसूस हुआ होगा इतने दिनों बाद रोयी थी भाभी कुछ भी काम नहीं करती है छोटा भाई ठेला लगाता है दादी बुजुर्ग है उनका भी काम मुझे करना पड़ता है उसके अंदर एक तूफ़ान सा दबा  हुआ था  जो आज 
बह रहा था पूरी क्लास शांत उसकी बेबसी को सुन रही थी मैडम ने कहा तुम अपने बड़े भाई को समझाओ और मना कर दो मैडम ने फिर कहा जब तक तुम आवाज नहीं उठाओगी तुम्हें ऐसे ही काम करना पड़ेगा उसे थोड़ा हल्का महसूस हुआ होगा ठीक है मैं बोल दूँगी धीरे से कहा मैडम ने फिर कहा ऐसे काम नहीं चलेगा तेज आवाज उठाओ सोनिया फिर रोने लगी उसके अंदर से आवाज आ रही थी आज मुझे रो लेने दो वह दादी के लिए और दादी उसके लिए अत्याचार सह रहे है जब से माँ छोड़ कर गयी है दादी ही माँ बाप दोनों है 

Monday, April 22, 2019

इंतज़ार 


" इंतज़ार को कुछ होना यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी ये सोचा नहीं 
हवा के दरख्ते में जब वो बहेगा 
तो फूलों के महकने की मंज़ूरी 
उसे न मिलेगी "
"किरणों की तलहटी में इंतज़ार 
को छुपना कुछ यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी ये बतलाया ही नहीं 
चाँद की रोशनी में जुगनुओं को 
भी उसकी मंज़ूरी न मिलेगी "
"आसमान को छूना इंतज़ार को 
कुछ यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी उड़ान भरी ही नहीं 
या कि पंछियों के सुरों को 
उसकी मंज़ूरी न मिलेगी "
"अनुभवी होना इंतज़ार को 
कुछ यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी गलतियाँ की ही नहीं 
या कि बचपन के खेलों को 
उसका न होना मंज़ूर न था
"बेलीक चलना इंतज़ार को कुछ यूँ मंज़ूर था
कि उसने कभी सीमाएं लांघी नहीं
या कि नदियों के धैर्य को उसका
न होना मंज़ूर न था "
"पलकों पर बैठना इंतज़ार को कुछ
यूँ मंज़ूर था
कि उसने कभी झपकियाँ ली ही नहीं
या कि टूटी नींद के सपनो को
उसका न होना मंज़ूर न था "
"कदम-दर-कदम इंतज़ार को होना
कुछ यूँ मंज़ूर था
कि उसने कभी रास्ता नापा ही नहीं
या कि मंज़िलो के ना होने की
मंज़ूरी उसको न मिलेगी "


 तीसरा तोहफा  शैशवावस्था के २ वर्ष पूरे करने के बाद अब तुम बाल्यावस्था में प्रवेश कर चुके हो जहाँ तुम्हारी हर हरकत को शब्दों में बयां कर पान...