सारा शहर विकलांग है
रास्ते जिन पर हर रोज
मज़िलों की आहट गुजरती है
उन पर आँसुओं के कदमो को
कदम भर जगह न मिली
भरे ज़माने की खाली रातों में
क्षण भर में अस्मिता छीनी
चीखी सन्नाटो के शहर में
भूल बैठी ,भूल बैठी की ये
सारा शहर विकलांग है
स्याह रातों की चीखों को
बड़े ही अदब से अनसुना
करना बखूबी मालूम है उसे
दहशत फ़ैल गयी शहर में
अस्तित्व पर जो दाग लगे
और पूछा गया - ये दाग ,
और कहाँ कहाँ है
किस किसने दिए ये दाग
बेशर्म हया थी मेरी जम्हूरियत
बदहवासी कांपती जुबान थी
इतना ही कह सकी बस
खुशनसीब होती जो कोख से
अस्तित्व में न आती ,
सड़क पर जो छींटे थे
हर एक ने हिस्से में बाटें थे
सिसकियाँ फाइल के पन्नों में
लिपटा दी जायेंगी अब ,
प्रमाण पत्र भी न माँगा
जायेगा चरित्र का ,
वो तो अब हर एक शख्शियत द्वारा
अखवारों किताबों और टीवी
पर बड़े ही अफसोस के साथ
सुबह की चाय में पढ़ लिया जायेगा
इंतज़ार रह जायेगा अगली सुबह
एक नयी खबर का |
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