Monday, April 22, 2019

इंतज़ार 


" इंतज़ार को कुछ होना यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी ये सोचा नहीं 
हवा के दरख्ते में जब वो बहेगा 
तो फूलों के महकने की मंज़ूरी 
उसे न मिलेगी "
"किरणों की तलहटी में इंतज़ार 
को छुपना कुछ यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी ये बतलाया ही नहीं 
चाँद की रोशनी में जुगनुओं को 
भी उसकी मंज़ूरी न मिलेगी "
"आसमान को छूना इंतज़ार को 
कुछ यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी उड़ान भरी ही नहीं 
या कि पंछियों के सुरों को 
उसकी मंज़ूरी न मिलेगी "
"अनुभवी होना इंतज़ार को 
कुछ यूँ मंज़ूर था 
कि उसने कभी गलतियाँ की ही नहीं 
या कि बचपन के खेलों को 
उसका न होना मंज़ूर न था
"बेलीक चलना इंतज़ार को कुछ यूँ मंज़ूर था
कि उसने कभी सीमाएं लांघी नहीं
या कि नदियों के धैर्य को उसका
न होना मंज़ूर न था "
"पलकों पर बैठना इंतज़ार को कुछ
यूँ मंज़ूर था
कि उसने कभी झपकियाँ ली ही नहीं
या कि टूटी नींद के सपनो को
उसका न होना मंज़ूर न था "
"कदम-दर-कदम इंतज़ार को होना
कुछ यूँ मंज़ूर था
कि उसने कभी रास्ता नापा ही नहीं
या कि मंज़िलो के ना होने की
मंज़ूरी उसको न मिलेगी "


Sunday, March 24, 2019

स्याही 


स्याही बिना कलम अधूरी
है की अधूरे से कदमो से
कलम की स्याही पूरी नहीं होती
रास्ते जो अधूरे से है
कुछ मेरे भी तो सोचा
कलम से उतारू कागज
के पर्दो पर
कलम जो भरकर चली थी
अपने स्याही के अस्तित्व से
कभी इस रंग में बुनी थी
कभी उस रंग में ढली थी
मिटा निशान सा छोड़ चली थी
थी कलम या स्याही कलम थी
स्याही डूबी पहचान कलम थी
मंज़िलो का दर्पण स्याही है
जो कलम से बनती है
उभर कागज पर क्या खूब छपती है
सफ़ेद कागजी पन्नो पे
रंगीन पहचान बनी थी|| | 


Wednesday, February 20, 2019

लकीरें खींच गयी मुल्क में
बाँट लिया गया आसमान
धोखे और छल ने लूटी
समाज की इंसानियत
वतन की आजादी को कायम
सरहद के ताबुओ में है
माँ का इंतज़ार ,
माँ के आँचल को तड़पा तो
खाक-ए-सुपुर्द हुआ
लघु बह गया बनकर कुर्बानी
उड़ी पतंग जैसे कटी डोर जिंदगी की
हाथ आयी बन तिरंगा ,
और रह गयी बस एक निशानी || 

Saturday, February 16, 2019

क्या लिखुँ जहाँ एक और देश के वीर जवान साजिश का शिकार हो गए है वही दूसरी ओर युवा श्रद्धांजलि दे रहे है
श्रद्धांजलि शब्द बहुत छोटा लग रहा है उनकी शहादत के आगे सोशल मीडिया पर आक्रोश जताया जा रहा है  जवानो को नमन किया जा रहा है  और असल जिंदगी में शाहगर्दी के बाद भी valentine day  मनाया गया
शहीदों की अमरता लिखुँ शहादत लिखुँ बूढ़ी माँ का विलाप लिखुँ या अपनी कायरता लिखुँ जो हम हाथ पर हाथ  रखे बस  श्रद्धांजलि दे रहे है  क्या शहीदों की कुर्बानी किसी व्याख्यान की मोहताज़ है या फिर किसी श्रद्धांजलि की  श्रद्धांजलि देने से पहले जाकर देखो उनकी चौखट पर वर्षो का इंतज़ार मिलेगा देखो उस सुनी माँग को जो  अब इंतज़ार भी नहीं कर सकती 

Tuesday, February 5, 2019


प्रकृति की जड़ चेतना को पकड़ने की होड़ इंसान को क्या ही समझ आएगी जब उसे खुद से किये वादों के लम्हें ही हर आईने के सामने बदलते नजर आते है 


Friday, January 18, 2019

कोमल पखुंडिया और कठोर रास्ते जो चल पड़े एक मंजिल जहाँ उनकी खूबसूरती फीकी तो न हुई पर जिन हवाओ के सहारे बहना था उन्हें एक तूफान का सा सबब बन हवाओं ने उनके वजूद को हिला दिया पर खुशबू आज भी रूह तक समायी है हौसला ए बुलंद के साथ 



Wednesday, January 16, 2019

कहाँ तो आसमान छूना था मुझे 

कहाँ तो आसमां छूना था मुझे
कहाँ दो फुट जमीन खोदी गयी मेरे लिए
कहाँ तो जमाने से बचाया मुझे
कहाँ मेरे अंदर के जमाने को  मारा गया
कहाँ तो भीड़ से बचाने का वायदा था
कहाँ भीङ मुझे ही बना दिया गया
कहाँ तो  नन्ही सी परी हूँ मैं कहा गया
कहाँ शैतान बन पंख काटे गए मेरे
कहाँ तो कंधे पर सैर करने की जिद थी मुझमें
कहाँ तो अब उँगली पकड़ने से भी डर लगता है
कहाँ तो नन्हे कदमों की आहट
से शोर मचाना था मुझे
कहाँ हवस की बेड़िया डाली गयी
कहाँ तो ईमान का पाठ पढ़ाना था मुझे 
कहाँ ईमान के सौदागरों को बेचा गया मुझे 
कहाँ तो सविंधान पढने की हिदायत दी 
कहाँ किताबों की बोली लगायी गयी 
कहाँ तो आँखों का तारा रखना ख्वाब था 
कहाँ महफिल की नुमाइश बना दिया मुझे 
कहाँ तो हाथो में मेहंदी लगनी थी मेरी 
कहाँ अपने हाथों को मेरे खून से रंगा गया 
कहाँ तो देश दुनिया की सैर कराने का वादा था 
कहाँ मुझे दुनिया से अलग कोख में मारा गया !!!!!


बेचेहरा स्याह रातें
बेबाक इस दुनिया में
तरकश भूमि जिसकी
मिट्टी हाथों से फिसली
रगों में अंगार भरती चली
वीरो की भूमि है ये ,
बंजर होके भी कभी
बुजदिल पैदा नहीं करती ,
शीश चढ़ाया अपने लाल का
ओढ़ी चुनर लाल खून से सनी
थामे लगाम हाथ में ,
निकल पड़ी परवाह दौड़ी
रगो में खुद से पहले देश की
कराया  नतमस्तक रुतबे को
चिंगारियों की मातृभूमि को 

Monday, December 24, 2018

क्या खूब कहा है उस ग़ालिब ने
जिंदगी जीना एक कला है
आँगन के उस सूखे पेड़ की छाँव में
सूरज निकलते हमने भी देखा है
नदियों के प्रवाह सी
प्रबल ज्वाला को
दर-दर भटकते देखा है || 


दिसंबर की धुप 

नरम धूप 
और ठण्डी छाँव 
बाँहो का फैलना 
गिनना और बुनना 
फिर रीझ जाना 
बुनते स्वेटर की 
चहलकदमी से धूप 
सेंकना था कि 
शरारतें मुट्ठी भर 
धुप छत से आँगन तक ले जाने की
वापस छत ,छत से आँगन 
और फिर से छत 
तक के सफर में 
धुप को कैद करने 
की जिद में रूठ कर बैठना 
या की चिढ़ जाना 
या चिढ़ा जाना किरणों को 
दिसम्बर की वो दुपहरी 
जब चौपाल लगे 
और परिंदो की 
कहानियो के बीच
खुली आँखों से सूरज 
को देखने की आरज़ू 
मुकम्मल हो || 

 तीसरा तोहफा  शैशवावस्था के २ वर्ष पूरे करने के बाद अब तुम बाल्यावस्था में प्रवेश कर चुके हो जहाँ तुम्हारी हर हरकत को शब्दों में बयां कर पान...