Wednesday, February 20, 2019

लकीरें खींच गयी मुल्क में
बाँट लिया गया आसमान
धोखे और छल ने लूटी
समाज की इंसानियत
वतन की आजादी को कायम
सरहद के ताबुओ में है
माँ का इंतज़ार ,
माँ के आँचल को तड़पा तो
खाक-ए-सुपुर्द हुआ
लघु बह गया बनकर कुर्बानी
उड़ी पतंग जैसे कटी डोर जिंदगी की
हाथ आयी बन तिरंगा ,
और रह गयी बस एक निशानी || 

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