Monday, April 8, 2019
Sunday, March 24, 2019
स्याही
स्याही बिना कलम अधूरी
है की अधूरे से कदमो से
कलम की स्याही पूरी नहीं होती
रास्ते जो अधूरे से है
कुछ मेरे भी तो सोचा
कलम से उतारू कागज
के पर्दो पर
कलम जो भरकर चली थी
अपने स्याही के अस्तित्व से
कभी इस रंग में बुनी थी
कभी उस रंग में ढली थी
मिटा निशान सा छोड़ चली थी
थी कलम या स्याही कलम थी
स्याही डूबी पहचान कलम थी
मंज़िलो का दर्पण स्याही है
जो कलम से बनती है
उभर कागज पर क्या खूब छपती है
सफ़ेद कागजी पन्नो पे
रंगीन पहचान बनी थी|| |
Wednesday, February 20, 2019
Saturday, February 16, 2019
क्या लिखुँ जहाँ एक और देश के वीर जवान साजिश का शिकार हो गए है वही दूसरी ओर युवा श्रद्धांजलि दे रहे है
श्रद्धांजलि शब्द बहुत छोटा लग रहा है उनकी शहादत के आगे सोशल मीडिया पर आक्रोश जताया जा रहा है जवानो को नमन किया जा रहा है और असल जिंदगी में शाहगर्दी के बाद भी valentine day मनाया गया
शहीदों की अमरता लिखुँ शहादत लिखुँ बूढ़ी माँ का विलाप लिखुँ या अपनी कायरता लिखुँ जो हम हाथ पर हाथ रखे बस श्रद्धांजलि दे रहे है क्या शहीदों की कुर्बानी किसी व्याख्यान की मोहताज़ है या फिर किसी श्रद्धांजलि की श्रद्धांजलि देने से पहले जाकर देखो उनकी चौखट पर वर्षो का इंतज़ार मिलेगा देखो उस सुनी माँग को जो अब इंतज़ार भी नहीं कर सकती
Wednesday, January 16, 2019
कहाँ तो आसमान छूना था मुझे
कहाँ तो आसमां छूना था मुझेकहाँ दो फुट जमीन खोदी गयी मेरे लिए
कहाँ तो जमाने से बचाया मुझे
कहाँ मेरे अंदर के जमाने को मारा गया
कहाँ तो भीड़ से बचाने का वायदा था
कहाँ भीङ मुझे ही बना दिया गया
कहाँ तो नन्ही सी परी हूँ मैं कहा गया
कहाँ शैतान बन पंख काटे गए मेरे
कहाँ तो कंधे पर सैर करने की जिद थी मुझमें
कहाँ तो अब उँगली पकड़ने से भी डर लगता है
कहाँ तो नन्हे कदमों की आहट
से शोर मचाना था मुझे
कहाँ हवस की बेड़िया डाली गयी
कहाँ तो ईमान का पाठ पढ़ाना था मुझे
कहाँ ईमान के सौदागरों को बेचा गया मुझे
कहाँ तो सविंधान पढने की हिदायत दी
कहाँ किताबों की बोली लगायी गयी
कहाँ तो आँखों का तारा रखना ख्वाब था
कहाँ महफिल की नुमाइश बना दिया मुझे
कहाँ तो हाथो में मेहंदी लगनी थी मेरी
कहाँ अपने हाथों को मेरे खून से रंगा गया
कहाँ तो देश दुनिया की सैर कराने का वादा था
कहाँ मुझे दुनिया से अलग कोख में मारा गया !!!!!
बेचेहरा स्याह रातें
बेबाक इस दुनिया में
तरकश भूमि जिसकी
मिट्टी हाथों से फिसली
रगों में अंगार भरती चली
वीरो की भूमि है ये ,
बंजर होके भी कभी
बुजदिल पैदा नहीं करती ,
शीश चढ़ाया अपने लाल का
ओढ़ी चुनर लाल खून से सनी
थामे लगाम हाथ में ,
निकल पड़ी परवाह दौड़ी
रगो में खुद से पहले देश की
कराया नतमस्तक रुतबे को
चिंगारियों की मातृभूमि को
Monday, December 24, 2018
दिसंबर की धुप
नरम धूप
और ठण्डी छाँव
बाँहो का फैलना
गिनना और बुनना
फिर रीझ जाना
बुनते स्वेटर की
चहलकदमी से धूप
सेंकना था कि
शरारतें मुट्ठी भर
धुप छत से आँगन तक ले जाने की
वापस छत ,छत से आँगन
और फिर से छत
तक के सफर में
धुप को कैद करने
की जिद में रूठ कर बैठना
या की चिढ़ जाना
या चिढ़ा जाना किरणों को
दिसम्बर की वो दुपहरी
जब चौपाल लगे
और परिंदो की
कहानियो के बीच
खुली आँखों से सूरज
को देखने की आरज़ू
मुकम्मल हो ||
चहलकदमी से धूप
सेंकना था कि
शरारतें मुट्ठी भर
धुप छत से आँगन तक ले जाने की
वापस छत ,छत से आँगन
और फिर से छत
तक के सफर में
धुप को कैद करने
की जिद में रूठ कर बैठना
या की चिढ़ जाना
या चिढ़ा जाना किरणों को
दिसम्बर की वो दुपहरी
जब चौपाल लगे
और परिंदो की
कहानियो के बीच
खुली आँखों से सूरज
को देखने की आरज़ू
मुकम्मल हो ||
Thursday, December 20, 2018
अस्तित्व
राह चलते अनुभव
को ठोकर लगी तो ,
अनुभवी की गोद में जा गिरा ,
सोचा यहाँ कुछ राहत मिलेगी
एक नई दिशा ठहरेगी ,
मेरी मंजिलों की
कहानियाँ होंगी,
उम्र में लिपटा इतिहास होगा
और पूछा सफर उससे
अपने अस्तित्व का
अनुभवी एकाएक दंभ था
देख कर अपने ही अनुभव को
छ्लक ही गये आँसु आँखों से
लफ्जो की चाल बूढी हो गयी
स्थिर है वो या अस्थिर
चलती है दुनिया
जिंदगी के अंधकार से
निकले झूठी रियायतों
के चकाचौंध में डूबे ,
अनसुनी हो जाती है
उनकी ही बातें जिनकी
शायद कभी उँगलियाँ
पकड़कर चलना सीखा ,
आँखों का तारा बनाये रखने
की जिद्द थी कभी ,
दशको गुजर आये शायद ,
बेचेहरा हो गए सभी ,
हाथों में लकीरें न थी
तुम्हें पाने की ,
मन्नत-दर-ठोकरें
खायी थी हमने
आज उसी आशियाने
का हिस्सा माँग ही लिया
ठोकरों की चोट से
अनुभवी सँभला
पर, ठुकराने की
कशक दिल से न गयी ,
देख कर अनुभव
अपना ये हाल सोच
अचम्भित ही था
और हो चला अलविदा
अपनों की ठोकरों से |
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