Wednesday, January 16, 2019
Monday, December 24, 2018
दिसंबर की धुप
नरम धूप
और ठण्डी छाँव
बाँहो का फैलना
गिनना और बुनना
फिर रीझ जाना
बुनते स्वेटर की
चहलकदमी से धूप
सेंकना था कि
शरारतें मुट्ठी भर
धुप छत से आँगन तक ले जाने की
वापस छत ,छत से आँगन
और फिर से छत
तक के सफर में
धुप को कैद करने
की जिद में रूठ कर बैठना
या की चिढ़ जाना
या चिढ़ा जाना किरणों को
दिसम्बर की वो दुपहरी
जब चौपाल लगे
और परिंदो की
कहानियो के बीच
खुली आँखों से सूरज
को देखने की आरज़ू
मुकम्मल हो ||
चहलकदमी से धूप
सेंकना था कि
शरारतें मुट्ठी भर
धुप छत से आँगन तक ले जाने की
वापस छत ,छत से आँगन
और फिर से छत
तक के सफर में
धुप को कैद करने
की जिद में रूठ कर बैठना
या की चिढ़ जाना
या चिढ़ा जाना किरणों को
दिसम्बर की वो दुपहरी
जब चौपाल लगे
और परिंदो की
कहानियो के बीच
खुली आँखों से सूरज
को देखने की आरज़ू
मुकम्मल हो ||
Thursday, December 20, 2018
अस्तित्व
राह चलते अनुभव
को ठोकर लगी तो ,
अनुभवी की गोद में जा गिरा ,
सोचा यहाँ कुछ राहत मिलेगी
एक नई दिशा ठहरेगी ,
मेरी मंजिलों की
कहानियाँ होंगी,
उम्र में लिपटा इतिहास होगा
और पूछा सफर उससे
अपने अस्तित्व का
अनुभवी एकाएक दंभ था
देख कर अपने ही अनुभव को
छ्लक ही गये आँसु आँखों से
लफ्जो की चाल बूढी हो गयी
स्थिर है वो या अस्थिर
चलती है दुनिया
जिंदगी के अंधकार से
निकले झूठी रियायतों
के चकाचौंध में डूबे ,
अनसुनी हो जाती है
उनकी ही बातें जिनकी
शायद कभी उँगलियाँ
पकड़कर चलना सीखा ,
आँखों का तारा बनाये रखने
की जिद्द थी कभी ,
दशको गुजर आये शायद ,
बेचेहरा हो गए सभी ,
हाथों में लकीरें न थी
तुम्हें पाने की ,
मन्नत-दर-ठोकरें
खायी थी हमने
आज उसी आशियाने
का हिस्सा माँग ही लिया
ठोकरों की चोट से
अनुभवी सँभला
पर, ठुकराने की
कशक दिल से न गयी ,
देख कर अनुभव
अपना ये हाल सोच
अचम्भित ही था
और हो चला अलविदा
अपनों की ठोकरों से |
Saturday, November 24, 2018
शब्द
वजह भी हूँ मैं ,
बेवजह भी शायद
परवाह करती हूँ
तो लिखती हूँ या
बेपरवाह शब्दों को सवारती हूँ
मोहब्बत है कलम से ,
तो पढ़ती हूँ कि ,
इश्क़ का मजहब बुनना
है तो उतारती हूँ स्याही
को कागज के परदे पर ,
जीने का सलीका सीखना
है तो सुनती हूँ
कि अनसुनी चीखों को
पढ़ने का नजरिया है मुझमें ,
अनुभवी बनना है तो
लकीरे खींचती हूँ या
खींची लकीरों के
पार जाना है मुझको
बेमूल्य रिश्तों की हिफाजत
है तो लिखती हूँ
कि ईमान के सौदागरो
की नज़रों से बचना है मुझे
समय कम है तो
बदलना है मुझे की ,
बीते समय की लड़ाईया
जहन में जिंदा है मेरे ,
आदतन लिखती हूँ
या की आगाज है नये
शब्दो का शब्द जो कि
हर पहलु में मेरे
अंदर के मुझमें छुपे
कहानियों के निगेहबान
शीशे को जिसकी
हर परछाई
तराशती है खुद को
मेरी कलम की बहती स्याही से
और इस तरह ये
बहस मेरे अंदर के
मुझसे चलती रहेगी
जिसके हर शब्द को
मेरी कलम आदतन
बेपरवाह स्याही से
आगाज़-ए -अंजाम देगी
बेवजह भी शायद
परवाह करती हूँ
तो लिखती हूँ या
बेपरवाह शब्दों को सवारती हूँ
मोहब्बत है कलम से ,
तो पढ़ती हूँ कि ,
इश्क़ का मजहब बुनना
है तो उतारती हूँ स्याही
को कागज के परदे पर ,
जीने का सलीका सीखना
है तो सुनती हूँ
कि अनसुनी चीखों को
पढ़ने का नजरिया है मुझमें ,
अनुभवी बनना है तो
लकीरे खींचती हूँ या
खींची लकीरों के
पार जाना है मुझको
बेमूल्य रिश्तों की हिफाजत
है तो लिखती हूँ
कि ईमान के सौदागरो
की नज़रों से बचना है मुझे
समय कम है तो
बदलना है मुझे की ,
बीते समय की लड़ाईया
जहन में जिंदा है मेरे ,
आदतन लिखती हूँ
या की आगाज है नये
शब्दो का शब्द जो कि
हर पहलु में मेरे
अंदर के मुझमें छुपे
कहानियों के निगेहबान
शीशे को जिसकी
हर परछाई
तराशती है खुद को
मेरी कलम की बहती स्याही से
और इस तरह ये
बहस मेरे अंदर के
मुझसे चलती रहेगी
जिसके हर शब्द को
मेरी कलम आदतन
बेपरवाह स्याही से
आगाज़-ए -अंजाम देगी
Monday, November 19, 2018
ख्वाइश है गगन को छू लू मैं
ख्वाइश है आसमान को पा लू मैं ,
ख्वाइश है हवा के झरोखों सी
झरोखों में बहते उन तिनको सी
तिनको की उस कल कल में
कल कल करती उस आवाज में
आवाज वो चिड़ियों के चहकने की
चहचहाट वो आँगन की
आँगन में बिखरी उन खुशियों की
खुशी वो आजाद परिंदे की
परिंदा जैसे खुले आसमान में उड़ने की
ख्वाइश है आज मेरी।।।
पूरी हुईं साँसे आ
अब लौट चले जीवन की ओर ,
जगत की मिथ्या को छोड
अनूठे संगम की ओर
गोल दुनिया के तिरछे
खींचे रास्तों से निकल ,
ईमान -ए -सौदागरो की
महफूज चारदीवारी में
कैद परिंदों की बेसब्री
आबाद हुई ,
झूठे रिश्तो की तालीम से
बेचेहरा हुई, स्याह रातो
की गर्त में डूबे ,
भोर के अँधेरो से निकले,
फिसले या तराशे खुद को
इस बेबाक दुनिया में।
अब लौट चले जीवन की ओर ,
जगत की मिथ्या को छोड
अनूठे संगम की ओर
गोल दुनिया के तिरछे
खींचे रास्तों से निकल ,
ईमान -ए -सौदागरो की
महफूज चारदीवारी में
कैद परिंदों की बेसब्री
आबाद हुई ,
झूठे रिश्तो की तालीम से
बेचेहरा हुई, स्याह रातो
की गर्त में डूबे ,
भोर के अँधेरो से निकले,
फिसले या तराशे खुद को
इस बेबाक दुनिया में।
Friday, May 18, 2018
वजह
वजह
मेरे आँसुओं से पूछो
ठहरने की वजह क्या है
वजह की गहराई से पूछो
छुपी निर्झारिडी शक्ति
बहती कम होती
ह्रदय के तिमिर से
पूछो मायूस होने
की वजह क्या है
तरसती आँखों से पूछो
प्यास की वजह क्या है
मेरी सिसकियों से पूछो
सुबकने की वजह क्या है
वजह की परछाई
से पूछो
भोर की कीमत क्या है
काश ! कोई मुझसे पूछो
मेरे आँसुओं की
वजह क्या है
Sunday, May 13, 2018
बदलाव
बदलाव
उषा की लालिमा को ,
सफेद चादर से ढकते देखा है
धुंध में चिड़ियों की चहचाहट
को दबते देखा है,
उगते सूरज की लहरों में
बर्फ को बहते देखा है
हारिल को पग पग फिरते देखा है
ओस की बूंदों को सूखे पत्तियों
पर फिसलते देखा है
तपती दुपहरी के बीच ललाटपर
लकीरों को खींचते देखा है
लकीरो के गर्त में आंसुओ
की वजह को दबते देखा है
है पानी के बुलबुले सा जीवन
आज उसी जीवन को उर्द्धन्द ज्वाल
में शान्त होते देखा है
सदिया गुजर गयी सहारा
बनाते बनाते, उसी सहारे को
सर जमीं पे शहादत ऐ
कुर्बान देखा है
छोटी इमारतों में दबे ऊँचे सपने
उस इमारत को द्रष्टि दी
जिन हाथो ने
आज उनकी सर की छत से
पानी टपकते देखा है
दो वक्त की रोटी को
वर्ष भर खेत में देखा है
कहते जिसे सोने की चिड़िया
आज उस देश के किसान को
कर्ज में डूबते मरते देखा है
सुना है कभी इस देश को '
विश्व गुरु की उपाधि दी थी
पर यह क्या
गुरु को शिष्या की आबरू
सरे आम करते देखा है
देश की शक्ति को
लघु लुहान देखा है
Sunday, September 17, 2017
एक बूँद ज़िंदगी
एक बूँद ज़िंदगी
सुना है जिंदगी खेल खेलती है खेल तो एक जिंदगी बन गयी है एक ऐसा खेल जिसमे निर्णायक भी
हम होते है और खिलाडी भी हम समझ में नहीं आता खिलाडी हम है या जिंदगी क्या कभी सोचा है
की निर्णायक होते हुए भी हम ही क्यों हार जाते है क्यों हताशा हमें मिलती है और दोष जिंदगी का
हारने में बड़ा मज़ा आता है और जीतने की कोशिश हम करते नहीं
जिंदगी हमसे नहीं कहती की ट्रैफिक लगने पर इधर उधर से निकले अपनों को बेसहारा छोड़ कर जाने
में जरा भी नहीं हिचकिचाते। हेलमेट सिर्फ दिखाने की वस्तु नही होती |
इसी हेलमेट में अपनों की आशाएं उत्साह जीवन की उमंग सपनो का सागर बसा होता है जिसे हम बेकार की वस्तु समझ छोड़ कर चले जाते है इसका परिणाम सपनो के सागर में तूफान बनकर आता है और दोष जिंदगी पर लगता है
काश ! यही बात उसने समझी होती तो आज उसके परिवार को लोगो की मीठी कहावत जो कड़वे शब्दो से कही जा रही नहीं सुननी पड़ती कहने को तो दस वर्ष हो गये उसे गुज़रे हुए पर आज भी उसके सपनो पर समाज के ताने बाने का ग्रहण लगा हुआ है काश ! उस दिन वह बाजार हेलमेट लगा कर जाता अब बस कहने की बात रह गयी हैउसका बड़ा बेटा अनूप जो अपनी माँ और छोटी बहन की परवरिश करने में लगा है एक फूड प्रोडक्टिंग कंपनी में काम करता है उनके लिए हर वो कोशिश करता है जिससे वो खुश रह सके बाहर से तो तीनो ही खुश नजर आते है मानो कुछ हुआ ही नही उनके सपने बुनने से पहले बिखरे नही पर अंदर ही अंदर सपनो का दलदल बनता जा रहा है जिसमे उनकी उम्मीद मानो डूब ही चुकी है अनूप की उम्मीद की किरण अभी बाकी है उगते सूरज की प्यास अभी जिन्दा है एक हफ्ते पहले जो मैनेजर के पद के लिए उसका इंटरव्यू हुआ था अब बस सभी की निगाहे उसी पर टिकी है
सुबह हो गयी न किसी ने नाश्ता किया न उसकी छोटी विद्यालय गयी अनूप और उसकी माँ की निगाहें दरवाजे पर टकटकी लगाए हुए है कि कब डाकिया आयेगा और वो पत्र लाएगा जिसमे उनका भविष्य
होगा आखिर थोड़ी देर बाद डाकिया आ ही जाता है और अनूप की मेहनत और काबिलियत उसकी माँ के माथे की लकीरें कम कर देती जो उसके पिता के मरने पर खींच गयी थी
इसी हेलमेट में अपनों की आशाएं उत्साह जीवन की उमंग सपनो का सागर बसा होता है जिसे हम बेकार की वस्तु समझ छोड़ कर चले जाते है इसका परिणाम सपनो के सागर में तूफान बनकर आता है और दोष जिंदगी पर लगता है
काश ! यही बात उसने समझी होती तो आज उसके परिवार को लोगो की मीठी कहावत जो कड़वे शब्दो से कही जा रही नहीं सुननी पड़ती कहने को तो दस वर्ष हो गये उसे गुज़रे हुए पर आज भी उसके सपनो पर समाज के ताने बाने का ग्रहण लगा हुआ है काश ! उस दिन वह बाजार हेलमेट लगा कर जाता अब बस कहने की बात रह गयी हैउसका बड़ा बेटा अनूप जो अपनी माँ और छोटी बहन की परवरिश करने में लगा है एक फूड प्रोडक्टिंग कंपनी में काम करता है उनके लिए हर वो कोशिश करता है जिससे वो खुश रह सके बाहर से तो तीनो ही खुश नजर आते है मानो कुछ हुआ ही नही उनके सपने बुनने से पहले बिखरे नही पर अंदर ही अंदर सपनो का दलदल बनता जा रहा है जिसमे उनकी उम्मीद मानो डूब ही चुकी है अनूप की उम्मीद की किरण अभी बाकी है उगते सूरज की प्यास अभी जिन्दा है एक हफ्ते पहले जो मैनेजर के पद के लिए उसका इंटरव्यू हुआ था अब बस सभी की निगाहे उसी पर टिकी है
सुबह हो गयी न किसी ने नाश्ता किया न उसकी छोटी विद्यालय गयी अनूप और उसकी माँ की निगाहें दरवाजे पर टकटकी लगाए हुए है कि कब डाकिया आयेगा और वो पत्र लाएगा जिसमे उनका भविष्य
होगा आखिर थोड़ी देर बाद डाकिया आ ही जाता है और अनूप की मेहनत और काबिलियत उसकी माँ के माथे की लकीरें कम कर देती जो उसके पिता के मरने पर खींच गयी थी
Sunday, September 10, 2017
आज फिर वो फुटपाथ पर सो गयी
आज फिर वो फुटपाथ पर सो गयी
छोड़ कर सपनो की नींद,
रात भूख के साथ सो गयी
ओढ़ी चादर बेबसी की
कल कोई आकर उसे
जगा ही दे उसकी भूख
मिटाने को खाना दे ही दे
तब तक गुंजती रही किलकारी
जो झकझोर रही उसकी
खामोशी सहन न कर सकी
भूख अपने उस त्याग की
जिसको उसने जन्म तो दिया
पर पेट भरने के लिए
उम्मीद न दे सकी ,
शर्मनाक होते इस झूठे
जहाँ में निकली वो जिस्म की
कैद से छोड़ कर रूह के
खाब बंध ही गया फंदा
और हो गयी पनाह
भूख के आबाद
सो गयी मौत की नींद
वो किलकारी के साथ
आखिर सो ही गयी वो
भूख के साथ मौत की नींद।।।।।
ओढ़ी चादर बेबसी की
कल कोई आकर उसे
जगा ही दे उसकी भूख
मिटाने को खाना दे ही दे
तब तक गुंजती रही किलकारी
जो झकझोर रही उसकी
खामोशी सहन न कर सकी
भूख अपने उस त्याग की
जिसको उसने जन्म तो दिया
पर पेट भरने के लिए
उम्मीद न दे सकी ,
शर्मनाक होते इस झूठे
जहाँ में निकली वो जिस्म की
कैद से छोड़ कर रूह के
खाब बंध ही गया फंदा
और हो गयी पनाह
भूख के आबाद
सो गयी मौत की नींद
वो किलकारी के साथ
आखिर सो ही गयी वो
भूख के साथ मौत की नींद।।।।।
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