Monday, November 19, 2018

पूरी हुईं साँसे आ
अब लौट चले जीवन की ओर ,
जगत की मिथ्या को छोड
अनूठे संगम की ओर
गोल दुनिया के तिरछे
खींचे रास्तों से निकल ,
ईमान -ए -सौदागरो की
महफूज चारदीवारी में
कैद परिंदों की बेसब्री
आबाद हुई ,
झूठे रिश्तो की तालीम से
बेचेहरा हुई, स्याह रातो
की गर्त में डूबे ,
भोर के अँधेरो से निकले,
फिसले या तराशे खुद को
इस बेबाक दुनिया में।

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