Sunday, June 4, 2017

चाँद

 चाँद 

उस रोज थी में 
ख्वावों की पनाह में 
ढलते सूरज की हसरत 
बिखेरे परछाई मुझ पर 
रंग बदल बदल कर 
गिरे आँसू  मेरे 
वजह थी क्या बता 
सका न वो चाँद भी 
दस्तक वो आहट सी 
रुखी बाते कर गुजर गया वो 
आँखो में झरोखों सी 
बात बुन गया वो

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